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द्रोण पर्व
अध्याय १५८
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धृतराष्ट्र उवाच
जृम्भमाणमिव व्याघ्रं व्यात्ताननमिवान्तकम् |  १५   क
कथं प्रत्युद्ययुर्द्रोणमस्यन्तं पाण्डुसृञ्जय़ाः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति