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आदि पर्व
अध्याय ६९
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शकुन्तलो उवाच
अतो हास्यतरं लोके किञ्चिदन्यन्न विद्यते |  १४   क
यत्र दुर्जन इत्याह दुर्जनः सज्जनं स्वय़म् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति