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आदि पर्व
अध्याय ११३
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वैशम्पाय़न उवाच
अनावृता हि सर्वेषां वर्णानामङ्गना भुवि |  १४   क
यथा गावः स्थितास्तात स्वे स्वे वर्णे तथा प्रजाः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति