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भीष्म पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
अकस्मात्पाण्डवान्हि त्वं द्विषसीति मतिर्मम |  ११   क
येनासि वहुशो रूक्षं चोदितः सूर्यनन्दन ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति