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शान्ति पर्व
अध्याय १०३
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भीष्म उवाच
मन्यते कर्शय़ित्वा तु क्षमा साध्विति शम्वरः |  ३१   क
असन्तप्तं तु यद्दारु प्रत्येति प्रकृतिं पुनः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति