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अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
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च्यवन उवाच
न च ते दुष्कृतं किञ्चिदहमासादय़ं गृहे |  १४   क
तेन जीवसि राजर्षे न भवेथास्ततोऽन्यथा ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति