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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो रात्र्यां व्यतीताय़ां कृतपूर्वाह्णिकक्रिय़ाः |  २३   क
हुत्वाग्निं विधिवत्सर्वे प्रय़युस्ते यथाक्रमम् |  २३   ख
उदङ्मुखा निरीक्षन्त उपवासपराय़णाः ||  २३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति