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शान्ति पर्व
अध्याय ४३
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वैशम्पाय़न उवाच
योनिस्त्वमस्य प्रलय़श्च कृष्ण; त्वमेवेदं सृजसि विश्वमग्रे |  १६   क
विश्वं चेदं त्वद्वशे विश्वय़ोने; नमोऽस्तु ते शार्ङ्गचक्रासिपाणे ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति