वन पर्व  अध्याय १८७

देव उवाच

व्रह्म वक्त्रं भुजौ क्षत्रमूरू मे संश्रिता विशः |  १३   क
पादौ शूद्रा भजन्ते मे विक्रमेण क्रमेण च ||  १३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति