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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
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जनमेजय़ उवाच
दृष्ट्वा पुत्रांस्तथा पौत्रान्सानुवन्धाञ्जनाधिपः |  १   क
धृतराष्ट्रः किमकरोद्राजा चैव युधिष्ठिरः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति