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अनुशासन पर्व
अध्याय १००
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पृथिव्यु उवाच
एवं कृत्वा वलिं सम्यग्दद्याद्भिक्षां द्विजातय़े |  १४   क
अलाभे व्राह्मणस्याग्नावग्रमुत्क्षिप्य निक्षिपेत् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति