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शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
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श्रीभगवानु उवाच
शनैश्चरः सूर्यपुत्रो भविष्यति मनुर्महान् |  ५२   क
तस्मिन्मन्वन्तरे चैव सप्तर्षिगणपूर्वकः |  ५२   ख
त्वमेव भविता वत्स मत्प्रसादान्न संशय़ः ||  ५२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति