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आदि पर्व
अध्याय १
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सूत उवाच
जनमेजय़स्य राजर्षेः सर्पसत्रे महात्मनः |  ८   क
समीपे पार्थिवेन्द्रस्य सम्यक्पारिक्षितस्य च ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति