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वन पर्व
अध्याय २३५
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वैशम्पाय़न उवाच
उपकारो महांस्तात कृतोऽय़ं मम खेचराः |  १४   क
कुलं न परिभूतं मे मोक्षेणास्य दुरात्मनः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति