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विराट पर्व
अध्याय २५
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वैशम्पाय़न उवाच
न तु तेषां गतिर्वासः प्रवृत्तिश्चोपलभ्यते |  १५   क
अत्याहितं वा गूढास्ते पारं वोर्मिमतो गताः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति