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सौप्तिक पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
गत्वा तु तावका राजन्नातिदूरमवस्थिताः |  १७   क
अपश्यन्त वनं घोरं नानाद्रुमलताकुलम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति