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सौप्तिक पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
उपेत्य तु तदा राजन्न्यग्रोधं ते महारथाः |  २२   क
ददृशुर्द्विपदां श्रेष्ठाः श्रेष्ठं तं वै वनस्पतिम् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति