सौप्तिक पर्व  अध्याय १

सञ्जय़ उवाच

तेऽवतीर्य रथेभ्यस्तु विप्रमुच्य च वाजिनः |  २३   क
उपस्पृश्य यथान्याय़ं सन्ध्यामन्वासत प्रभो ||  २३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति