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सौप्तिक पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्तं पर्वतश्रेष्ठमनुप्राप्ते दिवाकरे |  २४   क
सर्वस्य जगतो धात्री शर्वरी समपद्यत ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति