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सौप्तिक पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
ग्रहनक्षत्रताराभिः प्रकीर्णाभिरलङ्कृतम् |  २५   क
नभोंऽशुकमिवाभाति प्रेक्षणीय़ं समन्ततः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति