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सौप्तिक पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
ईषच्चापि प्रवल्गन्ति ये सत्त्वा रात्रिचारिणः |  २६   क
दिवाचराश्च ये सत्त्वास्ते निद्रावशमागताः ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति