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सौप्तिक पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्रात्रिमुखे घोरे दुःखशोकसमन्विताः |  २८   क
कृतवर्मा कृपो द्रौणिरुपोपविविशुः समम् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति