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सौप्तिक पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
निद्रय़ा च परीताङ्गा निषेदुर्धरणीतले |  ३०   क
श्रमेण सुदृढं युक्ता विक्षता विविधैः शरैः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति