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सौप्तिक पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
ततो निद्रावशं प्राप्तौ कृपभोजौ महारथौ |  ३१   क
सुखोचितावदुःखार्हौ निषण्णौ धरणीतले |  ३१   ख
तौ तु सुप्तौ महाराज श्रमशोकसमन्वितौ ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति