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सौप्तिक पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
क्रोधामर्षवशं प्राप्तो द्रोणपुत्रस्तु भारत |  ३२   क
नैव स्म स जगामाथ निद्रां सर्प इव श्वसन् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति