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सौप्तिक पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
सुप्तेषु तेषु काकेषु विस्रव्धेषु समन्ततः |  ३६   क
सोऽपश्यत्सहसाय़ान्तमुलूकं घोरदर्शनम् ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति