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सौप्तिक पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
सोऽथ शव्दं मृदुं कृत्वा लीय़मान इवाण्डजः |  ३८   क
न्यग्रोधस्य ततः शाखां प्रार्थय़ामास भारत ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति