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सौप्तिक पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
तद्दृष्ट्वा सोपधं कर्म कौशिकेन कृतं निशि |  ४३   क
तद्भावकृतसङ्कल्पो द्रौणिरेको व्यचिन्तय़त् ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति