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शान्ति पर्व
अध्याय ५४
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वासुदेव उवाच
भवान्हि वय़सा वृद्धः श्रुताचारसमन्वितः |  ३४   क
कुशलो राजधर्माणां पूर्वेषामपराश्च ये ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति