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सौप्तिक पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
परिश्रान्ते विदीर्णे च भुञ्जाने चापि शत्रुभिः |  ५१   क
प्रस्थाने च प्रवेशे च प्रहर्तव्यं रिपोर्वलम् ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति