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सौप्तिक पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
स क्रूरां मतिमास्थाय़ विनिश्चित्य मुहुर्मुहुः |  ५४   क
सुप्तौ प्रावोधय़त्तौ तु मातुलं भोजमेव च ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति