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सौप्तिक पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
नोत्तरं प्रतिपेदे च तत्र युक्तं ह्रिय़ा वृतः |  ५५   क
स मुहूर्तमिव ध्यात्वा वाष्पविह्वलमव्रवीत् ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति