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सौप्तिक पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
दिशं प्राचीं समाश्रित्य हृष्टानां गर्जतां भृशम् |  ६२   क
रथनेमिस्वनाश्चैव श्रूय़न्ते लोमहर्षणाः ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति