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शान्ति पर्व
अध्याय १७३
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भीष्म उवाच
सन्तुष्टश्चाप्रमत्तश्च यज्ञदानतपोरतिः |  ४९   क
ज्ञेय़ज्ञाता भवेय़ं वै वर्ज्यवर्जय़िता तथा ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति