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वन पर्व
अध्याय २१४
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मार्कण्डेय़ उवाच
षट्कृत्वस्तत्तु निक्षिप्तमग्ने रेतः कुरूत्तम |  १५   क
तस्मिन्कुण्डे प्रतिपदि कामिन्या स्वाहय़ा तदा ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति