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अनुशासन पर्व
अध्याय १
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गौतम्यु उवाच
विसृजैनमवुद्धिस्त्वं न वध्योऽर्जुनक त्वय़ा |  १४   क
को ह्यात्मानं गुरुं कुर्यात्प्राप्तव्ये सति चिन्तय़न् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति