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अनुशासन पर्व
अध्याय १
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लुव्धक उवाच
जानाम्येवं नेह गुणागुणज्ञाः; सर्वे निय़ुक्ता गुरवो वै भवन्ति |  १७   क
स्वस्थस्यैते तूपदेशा भवन्ति; तस्मात्क्षुद्रं सर्पमेनं हनिष्ये ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति