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अनुशासन पर्व
अध्याय १
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गौतम्यु उवाच
न चैवार्तिर्विद्यतेऽस्मद्विधानां; धर्मारामः सततं सज्जनो हि |  १९   क
नित्याय़स्तो वालजनो न चास्ति; धर्मो ह्येष प्रभवाम्यस्य नाहम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति