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द्रोण पर्व
अध्याय १५५
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सञ्जय़ उवाच
यद्येतन्न रहस्यं ते वक्तुमर्हस्यरिन्दम |  ९   क
धैर्यस्य वैकृतं व्रूहि त्वमद्य मधुसूदन ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति