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अनुशासन पर्व
अध्याय १
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गौतम्यु उवाच
कार्थप्राप्तिर्गृह्य शत्रुं निहत्य; का वा शान्तिः प्राप्य शत्रुं नमुक्त्वा |  २२   क
कस्मात्सौम्य भुजगे न क्षमेय़ं; मोक्षं वा किं कारणं नास्य कुर्याम् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति