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अनुशासन पर्व
अध्याय १
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लुव्धक उवाच
वृत्रं हत्वा देवराट्श्रेष्ठभाग्वै; यज्ञं हत्वा भागमवाप चैव |  २५   क
शूली देवो देववृत्तं कुरु त्वं; क्षिप्रं सर्पं जहि मा भूद्विशङ्का ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति