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अनुशासन पर्व
अध्याय १
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युधिष्ठिर उवाच
शराचितशरीरं हि तीव्रव्रणमुदीक्ष्य च |  ३   क
शमं नोपलभे वीर दुष्कृतान्येव चिन्तय़न् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति