अनुशासन पर्व  अध्याय १

सर्प उवाच

सर्व एते ह्यस्ववशा दण्डचक्रादय़ो यथा |  ३३   क
तथाहमपि तस्मान्मे नैष हेतुर्मतस्तव ||  ३३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति