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अनुशासन पर्व
अध्याय १
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सर्प उवाच
यथा हवींषि जुह्वाना मखे वै लुव्धकर्त्विजः |  ४१   क
न फलं प्राप्नुवन्त्यत्र परलोके तथा ह्यहम् ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति