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अनुशासन पर्व
अध्याय १
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सर्प उवाच
निर्दोषं दोषवन्तं वा न त्वा मृत्यो व्रवीम्यहम् |  ५१   क
त्वय़ाहं चोदित इति व्रवीम्येतावदेव तु ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति