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अनुशासन पर्व
अध्याय १
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सर्प उवाच
यदि काले तु दोषोऽस्ति यदि तत्रापि नेष्यते |  ५२   क
दोषो नैव परीक्ष्यो मे न ह्यत्राधिकृता वय़म् ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति