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अनुशासन पर्व
अध्याय १
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सर्प उवाच
निर्मोक्षस्त्वस्य दोषस्य मय़ा कार्यो यथा तथा |  ५३   क
मृत्यो विदोषः स्यामेव यथा तन्मे प्रय़ोजनम् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति