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अनुशासन पर्व
अध्याय १
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लुव्धक उवाच
मृत्योः श्रुतं मे वचनं तव चैव भुजङ्गम |  ५५   क
नैव तावद्विदोषत्वं भवति त्वय़ि पन्नग ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति