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वन पर्व
अध्याय १२०
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सात्यकिरु उवाच
त्वं ह्येव कोपात्पृथिवीमपीमां; संवेष्टय़ेस्तिष्ठतु शार्ङ्गधन्वा |  ६   क
स धार्तराष्ट्रं जहि सानुवन्धं; वृत्रं यथा देवपतिर्महेन्द्रः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति