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वन पर्व
अध्याय १२३
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लोमश उवाच
ततो मुहूर्तादुत्तीर्णाः सर्वे ते सरसस्ततः |  १७   क
दिव्यरूपधराः सर्वे युवानो मृष्टकुण्डलाः |  १७   ख
तुल्यरूपधराश्चैव मनसः प्रीतिवर्धनाः ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति