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वन पर्व
अध्याय २७
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वैशम्पाय़न उवाच
नाव्राह्मणस्तात चिरं वुभूषे; दिच्छन्निमं लोकममुं च जेतुम् |  ११   क
विनीतधर्मार्थमपेतमोहं; लव्ध्वा द्विजं नुदति नृपः सपत्नान् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति